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हम नापते तौलते शब्दों की 

झुंझलाहट पर 

अपनी चुप्पी साधे

डरी सहमी भाषा में 


सर झुकाकर 

बीते दिनों की सफहो में 

ढूंढते हैं कोई इक बात 

जो मिलती जुलती हो

हमारी आज की बेबसी से 


ताकि अपनी इस सहज 

बेबस सी चुप्पी पर 

मुस्कुराते हुए कह सकें 

होता आया है ये 

अरसो बरसो से

इसमें ऐसा 

कुछ नया तो नहीं 


गुंजन उपाध्याय पाठक

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