चाचा - भतीजा's image
Share0 Bookmarks 53 Reads1 Likes

          मुनीरी समाज की कहानी

  ( चाचा - भतीजा )       दिनांक २०/१०/२०२२

         
जिला बुलंदशहर , सिकंदराबाद जी टी रोड से गुड्डू मुनीरी ( सिकंदराबादी ) और उसका फुफेरा भाई निजाम मुनीरी पैदल पैदल घर लौट रहें थे दोपहर का वक्त था  न स्कूल, न ट्यूशन, न पढ़ाई बस खेलना एवम घर  के कार्य व चने - मूंगफली की दुकान के कामों में हाथ बटाना आदि था
   गुड्डू के चाचा ( अल्लादिया यानी ए डी खान ), अब्बा ( अब्दुल अजीज उर्फ बूचा ) और दादा ( अब्दुल रहमान ) साहब का दुकान संभालने के साथ साथ भाड़ पर चने - मूंगफली - मक्का - खील आदि भूनने व बेचने का काम था
       समाज में काफी प्यार, मुहब्बत व मेलजोल के साथ यह मुस्लिम भड़बूजा जाति के लोग रहते थे जिन्हे आज हम मुनीरी समाज के नाम से जानते है ।
       गुड्डू और निजाम दोनो जब जी टी रोड से घर लौट रहे थे कि घर पहुंचने से पहले ही निजाम के मामा और गुड्डू के चाचा यानी ( ए डी खान मुनीरी ) जी ने  उन्हें इशारा दिया और उन्हें घर से बीस कदम दूर दुकान के पास रोक लिया और कहा - इधर आओ और जरा जेब दिखाओ  दोनो ही डरे हुए बोले - जी चाचा- जी मामा ।
जब तक गुड्डू और निजाम पीछे होते तब तक उनकी जेब में ए. डी. जी का हाथ जा चुका था और उन जेबों से माचिस के बहुत से खाली खोल निकल आए । वह समझ गए थे कि आज इनके पास कोई काम नहीं है सिवाए इधर उधर भटकने के, यही वही माचिस के खोल होते थे जो लोग बीड़ी  माचिस की तिल्ली से जलाकर माचिस खाली होने पर इधर उधर रोड पर फेंक दिया करते थे और उनको गुड्डू और निजाम दोनो ही माचिस खोल फाड़कर कर उनके। ताश जैसे पत्ते बनाकर मेल जोल का खेल खेला करते है बच्चों में अक्सर यह होता है  वह अक्सर हर चीज में खेल और खुशी को तलाश करते है लेकिन दूसरे कारण एक यह भी था कि कुछ लोग ताश के पत्ते के बजाए वह इन माचिस के पत्तो का इस्तेमाल जुआ खेलने में किया करते थे ।
    इसी लत के डर से चाचा ने  गुड्डू और निजाम दोनो को लताड़ लगाई और माचिस खोल छीनकर कर कामधेनु सरिया वाली गली से घर की ओर रवाना किया यह कठोर रूप बच्चों के लिए गलत संगत से रोक और शिक्षित करने का प्रयास था जो सफल भी रहा ।
      दूसरी ओर यह दोनो बालक लगभग एक सात वर्ष तो दूसरा आठ वर्ष, की आयु से ऊपर हो चुके थे निजाम का तुतलाना काफी भाता था हंसी मजाक और व्यवहार में हमेशा आगे था तो गुड्डू भी कम नहीं था हर काम को बड़ी ईमानदारी से निभाता था जो काम मिला नही कि फटा फट तैयार जैसे के भाड़ की भट्टी में झोंका (लकड़ी का बुरादा ) डालना हो या बाजार से बर्फ लानी हो या फिर कुछ ओर ।
        अब बात ए डी खान चाचा की आती है पिता जैसे बाहर से कठोर तो अंदर से नर्म दिल भी थे । जब शाम को अक्सर दुकान बढ़ाने के बाद घर लौटते तो देखते कि कौन कौन बालक भांजे - भतीजे जागे हुए है उन्हे बुलाते और ले जाते अपने वेस्पा-चेतक स्कूटर पर सीधा नाहरी-कोरमा आदि मुस्लिम पकवान की दुकान पर जो बाजार में काफी मशहूर थी
        स्कूटर और चाचा के साथ भांजे - भतीजे यह सिल सिला हमेशा की यादगार बना रहा जैसे चाचा भतीजे न हो लंगोटिया यार हो खैर साथ ऐसा था कि
        चाचा के साथ अब्बा के ठिए की दुकान, दादा की दुकान या फिर भट्टी पर
        चाचा के साथ सिनेमा में , चाचा के साथ बाजार में , चाचा के साथ बस, जुगाड वाली गाड़ी , बुग्गी ,आदि की सवारी में भतीजो ने कही साथ न छोड़ा ।
        चाचा का मन बच्चों के साथ बहुत लगता था उनका सिद्धांत एक ही था कि भांजे -भतीजे जब तक है उनका भविष्य सुधार की तरफ जाए गलत संगत से बचे रहे ।
        गुड्डू मुनीरी खुद बचपन की यादें बताते है कि ए डी खान मुनीरी चाचा की शादी से पहले और बाद की बहुत सी यादें उनके साथ जुड़ी है जो उन्होंने एक परिवार के साथ सिकंदराबाद में बिताई है इस सत्य से कभी मुंह नही मोड़ा जा सकता ।
        ए डी खान मुनीरी साहब का लगाव हमेशा से आज भी सिकंदराबाद की ओर रहा है अब चाहे दोस्त हो या रिश्तेदार या फिर कई जगह जैसे सिंगल स्वीट्स जाना हो या रेवती स्वीट्स आदि जगह जाना हो हमेशा वही जाना उनको भाता रहा है ।
        लेकिन कल के दौर से गुजरते हुए आज के शिक्षा के दौर ने उन्हें अलग अलग शहरो में रवाना होना पड़ा और ना जाने कब कल के मुस्लिम भडबूजे समाज से निकल कर आज के मुनीरी समाज में दाखिल हुए और अल्लादिया से ए डी खान मुनीरी , हाजी होटल एंड केटर्स दादरी से विख्यात हुए वही भतीजा  बालक गुड्डू  से गुड्डू मुनीरी समाज का अपने शौक से एक लेखक बना और भांजा निजाम से  निजाम मुनीरी एक दहेज डिजायनर के रूप में विख्यात हो गया पता ही नही चला कि इतना लंबा समय कब निकल गया ।

       - गुड्डू मुनीरी ( सिकंदराबादी )
       

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts