कारवां-ए-ग़ज़ल's image
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ज़िंदगी जब ख़ुद से बात करती है,

तब कोई शेर बनता है।

जब निकल जाते है चाँद से दूर,

तब कोई शेर बनता है।

जब वो खिलखिला के हँसती है,

तब कोई शेर बनता है।

बिना उनके जब दिन गुजरता न हो,

तब कोई शेर बनता है।

महफ़िल में जब तन्हाईयाँ हो, 

तब कोई शेर बनता है।

जब छा जाये रूह में मस्ती बनके,

तब कोई शेर बनता है।

ज़िंदगी के इन्ही हसीन लम्हों से,

इक ग़ज़ल निकलती है।

©गोपाल भोजक




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