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हर रोज थोड़ा -थोड़ा बनती-बिगड़ती हूँ मैं

Geeta TandonGeeta Tandon April 17, 2022
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कुछ बनने के लिए

पहले जो हूँ उसमें से

कुछ तोड़ना

कुछ बिगाड़ना

कुछ बदलना

कुछ मिटाना

पड़ता है मुझे

तब जाकर थोड़ा -थोड़ा

हर रोज बनती हूँ

जब -जब कोशिश की कि-

बिना कुछ बिगाड़े ही

कुछ मिटाए ही बन जाऊँ मैं

तब-तब मैं बढ़ती तो गई

पर बन नहीं पाई

तब-तब मुझमें बढ़ता गया

अनचाही यादों का वजन

गैर ज़रूरी दुखों का बोझ

पुराने पड़े हुए

ज्ञान के पुलिंदों का ढेर

सड़े-गले विचारों का कचरा

और भी बहुत

जो भूत हो चुका था

जिसकी न तो मुझे जरुरत है

न मेरे भविष्य को

खुदको बनाने के लिए

जब तक खुद में से

बहुत कुछ निकालकर

बहुत कुछ उतारकर

फेंक नहीं देती

तब तक ठीक से

मैं बन नहीं पाती

इसलिए हर रोज

थोड़ा - थोड़ा खुदको

बिगाड़ती - बनाती हूँ मैं

तब कहीं जाकर

थोड़ा सा बनती हूँ मैं ...










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