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विसर्जित कर दो न!

Gautam KumarGautam Kumar May 15, 2022
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हठ दावानल सा फैल रहा, अब हाथ हमारे जख्मी हैं,

जुगनू के अनगिन शूरवीर, अब साथ हमारे जख्मी हैं

सागर में उठी तरंगों को, अब शांत कराना मुश्किल है

उद्दंड नदी रस्ता भूली, उद्गम तक लाना मुश्किल है


कुछ कच्चे पक्के दोस्त कहीं, अब अंतिम बार बुलाएंगे

कुछ स्याह स्वप्न में डूबेंगे, कुछ इंद्र धनुष बन जायेंगे

तुम अंतिम बार ज़िंदगी को, पीड़ाएँ अर्पित कर दो न!

जीवन का सारा भय, गठरी में बाँध विसर्जित कर दो न!


पीड़ाएँ कहीं प्रेयसी हैं, और मृत्यु किसी दुल्हन सी है,

जीवन की सीमाओं के आगे, सृष्टि किसी मधुबन सी है,

जीवन का सारा प्रेम किसी खारे सागर में भर दो न,

जो उड़ें हमेशा निडर कहीं ,ख्वाबों को ऐसे पर दो न!


जब काँटों का पथ चलना हो, तुम पाँव हमारे ले जाना

जब मरूभूमि में बहना हो, तुम छाँव हमारी ले जाना

तुम सारा दर्द ज़िंदगी का, अब मुझे समर्पित कर दो न!

जीवन का सारा भय, गठरी में बाँध विसर्जित कर दो न!

@adhura_safar

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