ख्वाब-ए-वस्ल's image
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ख़त में क्या लिखूँ तुझे, या यूँ कोरा ही भेज दूँ, 
लहूसे लिखे जज़्बात हैं ये, सियाहीभी क्यों ज़ाया करूँ

सामने जब तू आये तो ज़ुबान भी ना खुल सके,
काग़ज़ भी ना कुछ काम आयें, कहूँ तो कैसे कहूँ

कासीद भी ना मिले, तेरे घर का पता भी ना मिले,
ख़त भी ना भेज सकूँ, पैग़ाम-ओ-सलाम कैसे भेजूँ 

कम्बख़्त उसी वक़्त हवा का रूख भी ऐसा उल्टा चले,
ख़ुश्बूका पीछा करूँ, फिर भी तेरे घरतक भी ना पहुँच सकूँ

पास होते तू इतनी दूर लागे, तुझतक पहुँचना मुश्किल होता जाये,
तुझतक पहुँचनेकी कोशिश करूँ, इतनी हिम्मत ही ना कर पाऊँ

ये उम्र लागे ऐसे ही गुज़र जायेगी इन्तज़ार-ए-दीदार में, 
तेरे वस्ल का तो ख्वाब भी मैं कभी पूरा ना देख पाऊँ

इब्न ए बब्बन

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