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किसको बचाना ? सब अलग नांव यहां ,
एक लपेटे आया कतार यहां वहां ,
दुसरा झपका खींच कर जमीं पकड़ा गया ,
सीम के चाह लिये असीम कही मिलता ?
दुविधा का नींव ना देख विश्वास करा ,
चुपके चुपके अहम ष्डयंत्र से हरा ,
जान कर अंजान मैं धारणा गढ़ा ,
बेबुनियाद तोड़ा हुआ धुल सा पड़ा ।
बीतता ये पल को मैंने डायरी दिया ,
बेझीझक , बेरहम संस्कार को लिखा ,
अहम चोटिल अरे ! कैसे हो गया ?
अभेद कलम लिए सीधे भेदता रहा ।
अनुकम्पा बरसा पहला अनुभव को ,
प्रसन्न चित्त मन झन झन को ,
आया मजा ज़रा सा खेल को ,
समझा अब कल्प वृक्ष मेल को ।






          ~ गणेश मिश्रा

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