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ये सब जो व्याप्त है पर्याप्त है ,
कभी थमा नहीं था बेचैनी,
जो बिमारी है सब भ्रांत है,
कर्ता कौन ? कर्म किसके हाथ है?

शरीरों से गिनता अपना प्राण है,
कितना सुलभ मेहनतकश राज है,
अनुभव से बढ़ता मेरा हाथ है,
कर्मो में निहित हित और हात है।

मालिक है कर्ता और मालिक आप हैं,
निष्पक्षता पर और स्व में,
एकता मादा और नर में,
सही दृष्टि और दृष्टा आप है।

मेरे गुरु दृष्टा तो आप है।

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