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मैं जब जब भटका हूं

गणेश मिश्रागणेश मिश्रा March 8, 2022
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मैं जब जब भटका हूं , स्वार्थ पर चलता हूं ,
मैं जब जब भटका हूं , विचार गढ़ता हूं ,
मैं जब जब भटका हूं , अतीत दोहराता हूं ,
मैं जब जब भटका हूं , विचलन में पढ़ता हूं ।
कई बार यूं संसार से भीड़ता हूं ,
बहुतों बार टूटा हूं कभी कभी तोड़ जाता हूं ,
तोड़ते ही एक गुमान आता है ,
भूल जाता हू कि झिमी माया है ।
फिर टूटता इस सिख को रखा ,
विचार कर माया कहा कहा तक छुआ ,
अच्छा इतना करीब था तू ,
लेकिन तुझको ना चुना ,
चक्र ही चलाता है यहा ,
बस समझ का है जुआ ।






              ~ गणेश मिश्रा

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