खुद से बातें's image
Share0 Bookmarks 15 Reads0 Likes
मैं अपने दानव से भलीभांति परिचित हूं ,
वो वहां जो महामानव है उससे अकिंचत हूं ,
अहम खेल जाता कई बार वहम ,
बहला फुसला छाया कर लेता कायम ।
क्यों मैं झूठ को झूठ ना कहता हूं ,
क्यों मैं बार-बार मान ये लेता हूं ,
क्यों ये अंगारे विचलित कर जाते हैं ,
क्यों अपना स्थान भुलाई देता हूं ।
खेले या न खेले , खेल हमेशा जारी है ,
अहम भी बहुत ऊंचा परम कि दासीं है ,
तोहफे में निरंतरता भ्रम का लाती है ,
चारों ओर से चकित मुझे कर जाती है ।
किस-किस वार्ता से ठग कर तुम ले जाती हो ,
देखते-देखते इच्छा जागृत कर लाती हो ,
ये सब देखता हूं , कई बार ठग गया हूं जो ,
मैं भी तो सारा खेल लिखा फिरता हूं जो ।






          ~ गणेश मिश्रा

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts