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हम सब जानते हैं,
तो फिर क्यों? नहीं मानते ?
स्वीकारना नहीं चाहते,
पर क्या हो जायेगा?
कोई कुछ कर नहीं सकता है,
ना ही हम कुछ कर सकते हैं,
जब तथ्य है सत्य है,
फिर क्यों रोना और किसके लिए ? क्या खोना ,
बड़ा विडम्बना है जानते हैं ,
भूल को भूल से सुधारते हैं,
और पुनः भटकते जाते हैं,
कभी उस क्षण देखा करो ,
जब तुम, तुम ना रहते हो ,
किस प्रकार षड्यंत्र रचकर तुम खुद को चलते हो,
फिर पुनः द्वंद में फंसकर तुम धारणा को गढ़ते हो ,
यह सब अचेत एक तरफ तुम बेहोश जब रहते हो,
सब समझ जाओगे आगे यदि तुम खुद को पढ़ते हो।

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