जागृति's image
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अभी तो तोड़े टूटा हूं , कविता बनकर फूटा हूं ,
कई दिनों से सोया सोया , आज जगाया ऊठा हूं ,
मन पे छाले जाले-जाले , असत्य सत्य का नाम संभाले ,
क्या पता क्या-क्या करके बैठा हूं।

कई वर्षों से नेत्रहीन था ,
मन पर गहरा खेद भी था ,
ज्योति - ज्योति अनुभव हो जाते ,
बलहीन देख मैं पाता हूं।

आगे रास्ता चलना बाकी ,
फिर मिलूंगा अगली साखी ,
सांस आखिरी लिखना साथी ,
ईमान शान से कहना भारती ।





         ~ गणेश मिश्रा 

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