दिशा भ्रमित's image
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लिखना जो बन्द था , अहंकार मन गुल गया ,
लत तोड़ने लगा , तर्क का नर्क चलने लग गया ,
पढ़ता था जो खाली समयों में , खाली संसार से भर गया ,
चक्र में पुनः फसा , फिर से एक हार को जड़ गया ।
भ्रमण केन्द्र से चलने वाला , विचलन चल-पल पड़ गया ,
आंखों की ज्योति धीमी पड़ती , मुझे दिखाई पड़ गया ,
इतने दिनों का बंधन स्पंदन , सपाट अंकन कर दिया ,
और कितना धूल है बाकी , कविता खिलते मिलेगा ।

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