भीतर और बाहर's image
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अहंकार हमारा फूट पड़ा है,
सहमा-सहमा रहता बदलते,
सीमा अपना छूट चला है,
बहता न था जो आज बहा है।

पहल बार ये आज हुआ है,
हला-हल विषयों का वार किया है,
उच्चारण का उच्च स्वर से,
जबान नियंत्रण पार रहा है।

तोड़ा मान मर्यादा सारे,
पशुता का व्यवहार रहा है,
अहंकार जो फूट पड़ा है,
दिल भीतर से टूट खड़ा है।

चुनौतीपूर्ण के वादों में अब,
ललकार झलक के तेज तप बल,
बिन सोचे बिन समझे कुछ,
कहता निर्मम कैसा ? जो आज कहा है।

बहुत कह दिया है,
निभाना आज से ,
पलटते मन पर बरसे,
झेलना है जितना आज कहा है,
आराम करना आलस में?
हमको थके रहना है।

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