अंधभ्रांत's image
Share0 Bookmarks 58 Reads0 Likes
नींद की जगह विचारे चर रहे ,
इतना हम अलग रह रहे ,
देखता तथ्य मगर वंचित अध्यक्ष से रहे ,
दिया षड को जगह और कहते सत्य को रहे ।
अंधकार से एक दफा सामना हुआ ,
सीमाये , जड़े , जो फन फना के जागने लगे ,
आंखें देखते तीतर बीतर मैं लक्ष्य से हुआ ,
हां उस अवस्था को मुझे अहंता ने छुआ ।
डर का ज्वर , जोर जोर से चिखारता ,
मौन मन , के कहर को , मैं निहारता ,
ऊर्जा प्रभावकार , पर मैं अडिगता ,
आजा आज देखता हूं किसमें प्रखरता ।



                   ~ गणेश मिश्रा

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts