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दरख़्त को काट रहा है मनुष्य
और मनुष्य को काट रहा है तख़्त,
तख़्त काट रहा है मानवता को
और मानवता गुहार लगा रही है दरख़्त को

~ गजेन्द्र सिंह(अलिख)

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