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तुम मेरी आखरी मोहब्बत हो ज़ीनत।

Gulsher AhmadGulsher Ahmad December 12, 2022
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मुझे तुमसे कुछ कहना है ज़ीनत,
बैठो कि मैं तुमसे कह सकूं कि
मेरा दिल कट रहा है ज़ीनत।

मेरी आरज़ू तुम्हारी ख़ुशी से ज़्यादा कुछ भी नही लेकिन
मेरी तुमसे मोहब्बत मुझे इस बात की इजाज़त नहीं देती
कि मैं तुमको किसी और के साथ देख कर खुश भी हो जाऊं ज़ीनत।

तुम मेरे लिए उस दरिया की ख़ामोश साहिल हो जिसके अंदर तूफान मचा हुआ है ज़ीनत; 
मैं उस तूफान में भटक रहा हूँ और तुम जैसे ख़ामोश साहिल की खोज में हूँ।

मैं तुम्हारे पास ठहर जाना चाहता हूँ ज़ीनत,
मैं तुम पर मर जाना चाहता हूँ ज़ीनत।
मैं मरना भी चाहता हूँ तो बस तुम-तक पहुँचने के बाद ज़ीनत।

तुम खुश हो; माशा-अल्लाह! मैं यही तो चाहता हूँ ज़ीनत।
लेकिन एक कोई आशिक, कोई दीवाना मुझे देखेगा तो मेरी आँखों के बोझ को समझ सकेगा।
वही बताएगा कि किस कर्ब से मैं गुज़र रहा हूँ।

तुम मेरे लिए हर ख़ामोश रात की आख़री पहर जैसी हो ज़ीनत।
जहाँ हर कोई बहुत सुकून से सो रहा होता है और ऐसे सो रहा होता है; जैसे उसने अपनी जिंदगी में सब कुछ पा लिया हो।
और जब उस सुकून भरी नींद से खुदा के "हैय्या लस्सलाह" से उठता है तब वो अपने रब की याद में उसके सजदे करता है।

तुम मुझको मेरे ख़ुदा की तरफ रूजू करने वाली एक परी हो ज़ीनत। वही परी जो हमें वो हर खूबसूरत ख़्वाब दिखाती है जो हम देखना चाहते हैं और इस ज़िंदगी से मोहब्बत करने लगते हैं। 
तुम मुझे ज़िंदगी से मिलाने वाली परी हो ज़ीनत।

तुम से जाते हुए एक आख़री गुज़ारिश है कि तुम अपने अंदर की मासूम परी को हमेशा ज़िंदा रखना। तुम इस बेवफ़ा और ख़ुदग़र्ज़ दुनिया के झमेले और उलझनों में नही फंसना। उस शख़्स के माथे को चूम लेना जिसे तुम्हारा वस्ल मिल गया है। 

मैं अपने हिज़्र को तुम्हारी ख़ूबसूरत मुस्कान से जीता रहूंगा; मैं इस हिज़्र को अब अपना मुस्तकबिल मान चुका हूँ;
तुम मेरी आखरी मोहब्बत हो ज़ीनत।

मुझे तुमसे कुछ कहना है ज़ीनत,
बैठो कि मैं तुमसे कह सकूं कि
मेरा दिल कट रहा है ज़ीनत।

~"अहमद"

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