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बेरोज़गारी और गुज़ारिश

Gulsher AhmadGulsher Ahmad November 30, 2021
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कुछ दिनों पहले मैं एक इंटरव्यू देने गया था। जब हम इंटरव्यू के लिए जाते हैं तो बहुत सारे लोग मिलते हैं; कुछ आपके उम्र से बड़े और कुछ छोटे भी होते हैं। सभी में समानता यही होती है कि वो बेरोज़गारी में जी रहे होते हैं और कैसे भी, नौकरी पा लेने की जुगत में होते हैं। ऐसे सभी लोगों में एक और समानता होती है कि सभी के जेब बहुत ठंडे; मतलब की ख़ाली होते हैं। कुछ लोग होते हैं जिनके बड़े भाई या पिता या कोई ऐसा उनका बड़ा होता है जो मज़ाक-मज़ाक में जेब या अकाउंट में पैसे डाल देते हैं; तब उन्हें पैसों की तंगी बिलकुल महसूस नहीं होती है। ऐसे ही लोगों में मैं भी था; मेरे अब्बा ने मेरे अकाउंट मे पैसे डाल दिए थे।

ख़ैर! उस दिन मैं एक लड़के से मिला। मैं उसका नाम यहाँ लिखना चाहता हूँ लेकिन मैं लिख नही पा रहा हूँ; इसकी मेरी अपनी वजाहत है। खैर! इंटरव्यू में उसका सिलेक्शन नही हुआ और मुझे भी एक उम्मीद की लड्डू दे कर भेजा गया की HR का फाइनल कॉल आपको आ जायेगा। नियति कुछ ऐसी थी कि हम दोनो वहाँ से साथ निकले। दो-तीन घंटे साथ में उस दफ़्तर के कोरिडोर में बैठते-उठते इतनी दोस्ती तो हो ही गई थी कि हम साथ निकल सके; दोनो एक मायूसी के साथ निकले। मायूसी इसलिए कि दोनो को आस थी कि यहाँ हमारा कुछ हो जायेगा। 

मैंने बाहर आते ही कहा कि अगले चौराहे तक के लिए ऑटो ले लेते हैं। उसने मना कर दिया। कहता है "क्या यार इतनी करीब जाने के लिए क्या ऑटो लें; चलो वॉक करते हुए चलते हैं। एक दो किलोमीटर तो होगा ही; बस।" 
मैं आश्चर्यचकित होते हुए उसका चेहरा देखा और मुस्कुराते हुए कहा "बस।" 
वो भी हंसने लगा और हम दोनो "भारत देश, बेरोज़गारी और राजनीति" पर बात करते हुए आगे बढ़ गए। 

"वाकई देश में बहुत बेरोज़गारी आ गई है भाई।" उसने कहा।

" हां यार; मैंने भी "सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के ताजा आंकड़ों को पढ़ा; एक महीने में यानी जुलाई 2021 के मुकाबले अगस्त 2021 में 15 लाख के करीब जॉब अपॉर्चुनिटी घट गई और बेरोजगारी दर (Unemployment Rate) जुलाई के 6.96% से बढ़कर अगस्त में 8.32% हो गई. 
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के इंस्टीट्यूशनल हेड प्रभाकर सिंह ने बताया कि "जुलाई से अगस्त, 2021" के बीच एक महीने में करीब 40 लाख अतिरिक्त लोग जॉब मार्केट में नौकरी खोजने के लिए पहुंचे।" मैंने अपनी ताज़ा जानकारी साझा की।

"बताओ! खैर से भाई; एक बात की ख़ुशी है कि सिर्फ हम दो लोग ही नही हैं।" उसने कहा और हम दोनों हंसने लगे।

"यार जानते हो; इन आंकड़ों से ज़्यादा दुःख तो एक सवाल से होता है; क्या भाई कुछ हुआ तुम्हारे जॉब का; कब तक बेरोज़गार घूमोगे?" वो थोड़ा इमोशनल हो गया।

"अरे कोई न भाई; बोल दिया कर कि हो जायेगा।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"भाई थोड़ा भूख लग रही है। चलो छोले-भटूरे खाते हैं।" मैंने अपने पेट पर हाथ फेरते और सड़क के किनारे छोले भटूरे के ठेले की तरफ देखते हुए बोला।

"अरे नही भाई। मैं अपने दोस्तों के साथ रहता हूं। उन्होंने मेरा खाना बना दिया होगा।" उसने मना किया। 

"यार; तुम्हारा घर इतना दूर है। तुमको पहुंचने में भी घंटे लगेंगे अभी। और टाइम तो देख; तीन बज गए हैं।" मैंने अपनी हाथ की घड़ी उसे दिखाई।

"अरे भाई, वो बात नही है।" वो इधर-उधर देख रहा था। उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था उसे भी मेरे जितनी ही भूख लगी है। इंसान की यही तो खूबी है और खामी भी कि चेहरा कुछ छुपा ही नही पाता। और भूख तो बिल्कुल भी नही। कुछ भी समय पर हो या न हो लेकिन भूख बिलकुल समय पर लग जाती है।
 
मैंने पूछ "तो फिर क्या बात है?"

"यार; मेरे पास इतने ही पैसे हैं कि मैं कमरे तक जा सकता हूं। इसीलिए तो वहाँ से ऑटो भी नही लिया।" वो अपना वॉलेट निकल कर दिखाने लगा।

मैं निःशब्द था। मैं खामोश था। शॉक्ड में था। वो मुझसे नज़रे नही मिला पा रहा था। मैं भी इधर-उधर देखने लगा। मैंने बस उसके कंधे पर हाथ रखे; हमने एक दूसरे से अब कोई बात नही की। हम दोनो ने छोले-भटूरे खाए लेकिन कोई बात नही हुई। वहाँ से लगभग और आधा किलोमीटर वॉक करके चराहे तक गए, लेकिन हमारी कोई बात नही हुई। घर से निकलते हुए जैसे मेरे बड़े भाई ने मेरे शर्ट की जेब में कुछ पैसे डाले थे; मैंने भी कुछ रुपए उसके शर्ट की जेब में डाल दिए। वो मेरे गले लग गया। बस आई और वो चला गया।  

मुझे रोना आ रहा था लेकिन नही रो पाया। मैं वही सड़क पर बहुत तेज़ दौड़ना चाहता था लेकिन नही दौड़ पाया। पास में ही एक दुकान के बाहर की सीढ़ियों पर देर तक बैठा रहा। आपको लग रहा होगा कि ज़्यादा ही सेंटी हो रहा है। ऐसा नहीं है। 

आज-कल हमारे आस-पास ऐसे बहुत से जवान लड़के हैं जिनकी कॉलेज की पढ़ाई खत्म हो गई है लेकिन वो न किसी नौकरी पर लग पाए हैं और न ही किसी जॉब में। अब "नौकरी और जॉब" में क्या फ़र्क है ये फिर कभी बताऊंगा; लेकिन अभी एक गुज़ारिश करूंगा। यदि आपके आस-पास ऐसा कोई लड़का मिल जाए तो कोई ऐसा सवाल मत कीजिए; जिसके जवाब की हमने कभी तैयारी ही नही की और न ही किसी और ने तैयारी की होगी कि बेरोज़गारी के सवाल का वो क्या जवाब देगा। 

मैं सिर्फ एक लड़के से मिला लेकिन ऐसे बहुत सारे नौजवान लड़के हैं जो दो किलोमीटर तक वॉक कर लेते हैं ये सोच कर कि शायद ₹10 बच जाए तो आगे के किराए में लगा दूंगा। सड़क पर चलते हुए कपड़े, जूते, चप्पल, चश्मे, परफ्यूम तो दूर की बात कभी-कभी भूखे-प्यासे अपने कमरे पर लौट आते हैं ताकि वो पैसे कहीं इंटरव्यू देने जायेंगे तो किराए पर खर्च करेंगे। 

मैं मानता हूँ कि बहुत सारे लोगों के मस्तिष्क में ये सवाल पैदा होगा कि घर बता देता; घर से पैसे ले लेता। इस सिचुएशन में दो बातें आ जाती हैं। पहला कि शायद हो सकता है कि उसकी फैमिली इतनी कैपेबल न हो। दूसरा और सबसे जरूरी कि हम सभी के जीवन में एक ऐसी उम्र आती है जब हम घर से पैसे लेते हैं तो शर्म आने लगती है। अंदर से मन "मरने" लगता है। ख़ुद से ही घुटन होने लगती है और सबसे बड़ी बात कि खूद से ही हीनता( Inferiority ) होने लगती है। 

ऐसी बहुत सारी बातें हैं जो हमे सोचने की ज़रूरत है। ज़रूरत है कि अगर कहीं कुछ पता चले तो हम बेरोज़गार बच्चों की मदद करके उनको रोज़गार दिलवा दें और अगर इतना नही कर सकते तो इतना ज़रूर कर सकते हैं कि उनके अपने ज़ख्मों पर सवालों और तंज़काशी के नमक ना रगड़ें। बाकी आप अल्लाह का शुक्र अदा करें और खुश रहें।

~"अहमद"

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