ज़िंदगी राख, ख्वाहिशें ख़ाक...'s image
Poetry1 min read

ज़िंदगी राख, ख्वाहिशें ख़ाक...

Dr. SandeepDr. Sandeep November 27, 2021
Share0 Bookmarks 88 Reads1 Likes

मैंने अपने यार को श्मशान में ख़ाक होते देखा है

बे-फ़िक्र, बे-ख़ौफ़ होकर दर-ए-अफ़्लाक जाते देखा है..

सब बंदिशें तोड़ वो हवा बन फ़लक में फ़ना हो गई

मैंने उसे उस आग में बदन-ए-पाक होते देखा है..

उसके जाने के बाद अंदर से मैं बिखर गया हूँ

उसकी यादों में ख़ुद को बदहवास होते देखा है..

नजदीकियां फ़ासलों में कब तब्दील हुई पता न चला

अपनों के दूर जाते ही ख़्वाबों को राख होते देखा है..

देखा था नज़ारा ख़ौफ़नाक मैंने उस दौर का

मैंने कोरोना से जवानों को हलाक होते देखा है..

अब दे दो कुछ आग कि ख़ुद को भी ख़ाक कर लूँ

तबाही के उस मंज़र में ज़िंदगी को बर्बाद होते देखा है..!!

#तुष्य..

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts