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साक़ी-ए-मयख़ाना (Part-3)…

Dr. SandeepDr. Sandeep March 3, 2022
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आरज़ू-ए-दिल में अब न रहे कुछ बाकी

मय-ए-इश्क़ ला और भर दे जाम साक़ी..

कोई गिला-शिकवा न रहे यहाँ किसी को

बज़्म-ए-इश्क़ में न पीना है हराम साक़ी..

मय-क़दे का भी अज़ब ही दस्तूर है यहाँ

न पीओगे तो करेंगे लोग बदनाम साक़ी..

नशे में मस्त हैं सब यहाँ जाम-ए-मय लेकर

मयख़ाने में चलता रहेगा दौर-ए-जाम साक़ी..

पीने वालों को नहीं मालूम हाल-ए-वक़्त का

मदमस्तों को सहर भी लगे है शाम साक़ी..

मुझको भी तू अपनी आग़ोश-ए-रहमत में लेले

मैं भी ता-उम्र लेता रहूँगा तेरा ही नाम साक़ी..

निगाह-ए-मस्त से कुछ नज़र-ए-करम कर मुझपर

मुझको भी पिला दे अपनी नज़रों को जाम साक़ी..

मैं हो गया हूँ तेरी इन नज़रों का ग़ुलाम साक़ी..!!

#तुष्य

मय-ए-इश्क़: प्रेम की मदिर, बज़्म-ए-इश्क़: प्रेमसभा, मय-क़दे: मैख़ान, जाम-ए-मय: शराब का पियाला, निगाह-ए-मस्त: नशीली आँख

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