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नूर-ए-क़लम (Part-3)

Dr. SandeepDr. Sandeep December 20, 2021
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जज़्बातों भरे अल्फ़ाज़ों में बे-मिसाल हो तुम

काग़ज़ पर उतारे एहसासों में बा-कमाल हो तुम..

लफ़्जों की ज़रूरत नहीं तेरी ख़ामोशी पहचानता हूँ

क्योंकि मुझ अहल-ए-क़लम की हम-ख़याल हो तुम..

कोई बनावट नहीं छिपी है इस हुस्न-ए-अज़ल के पीछे

लख़नवी अंदाज़ में सादगी की परी-जमाल हो तुम..

इस अंदाज़-ए-बयाँ पर कौन ना मर जाए ऐ ख़ुदा

उस फ़नकार का जमीं पर उतारा शाहकार हो तुम..

ऐ नूर-ए-क़लम क्या तारीफ़ करूँ मैं तेरी क़लम की

एहसासों भरी इन नज़्मों की पैग़ाम-ए-बहार हो तुम..!!

#तुष्य

अहल-ए-क़लम: साहित्यिक स्वभाव का व्यक्ति, हुस्न-ए-अज़ल: अनन्त सौंदर्य, परी-जमाल: परियों-जैसा सौन्दर्य, शाहकार: अति उत्तम रचना

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