नूर-ए-क़लम (Part-2)'s image
Poetry2 min read

नूर-ए-क़लम (Part-2)

Dr. SandeepDr. Sandeep November 25, 2021
Share0 Bookmarks 56 Reads1 Likes

लफ़्ज़ दिल से...

जज़्बात तेरे मेरे काग़ज़-ए-बे-रंग को निखार देते हैं

दिल-ए-मुज़्तर को उम्मीद-ए-बहार से सँवार देते हैं..

लफ़्ज़ तेरे मेरी सहव-ए-क़लम को सुधार देते हैं

हालात-ए-ज़िंदगी पर लिखे शब्दों को उभार देते हैं..

अल्फ़ाज़ तेरे मिजाज़-ए-इश्क़ को लज़ीज़ बना देते हैं

फीक़े पड़ चुके अरमानों में जोश-ए-जुनूँ बढ़ा देते हैं..

दर्द तेरे इन आँखों में तिफ़्ल-ए-अश्क ला देते हैं

सियाह रातों में मेरी आँखों से नींदें उड़ा देते हैं..

मुस्कान तेरी बेजान शाख़ों पर फूल खिला देते हैं

तकलीफ़-ए-ज़िंदगी में भी जीना सिखा देते हैं..!!

#तुष्य

काग़ज़-ए-बेरंग: रंगहीन कागज, दिल-ए-मुज़्तर: अशांत ह्रदय, उम्मीद-ए-बहार: वसंत की आस, सहव-ए-क़लम: लेखनी-भ्रम, जोश-ए-जुनूँ: दीवाना पन, तिफ़्ल-ए-अश्क: आँसुओं की बूंदें


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts