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ख़्वाब-ए-दीदार-ए-यार...

Dr. SandeepDr. Sandeep June 16, 2022
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जो ख़्वाब बह गए थे उन को मैंने संजो लिया

समेट कर उन को अपनी यादों में पिरो लिया..

अब शायद हल्की हो गई होंगी तुम्हारी आँखें

क्योंकि उनसे मैंने अपनी पलकों को भिगो लिया..

अब तुम फूलों से महकते नए-नए ख़्वाब सजाना

क्योंकि जो थे उनमें काँटें मैंने ख़ुदको चुभो लिया..

न मुरझाने दूँगा बाग-ए-गुल-ए-सुर्ख़ की ख़ुशबू को

मैंने तेरी दोस्ती को इत्र-ए-गुलाब में डुबो लिया..

मेरे ज़हन-ए-जज़्बात पर तुम इस क़दर छाई हो

कि मैंने तेरे वज़ूद को अपनी रूह में समो लिया..!!

#तुष्य

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