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अश्क-ए-ग़म...

Dr. SandeepDr. Sandeep November 27, 2021
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कभी किसी के सामने खुल कर रोया नहीं

क्योंकि आज तक अपना यार था खोया नहीं..

पर जब वो बिछड़ा अब सुकून से क्या रिश्ता

अब सिर्फ़ जागता हूँ कई रातों से सोया नहीं..

मैं उसे दिल-ओ-जान से मोहब्बत करता था

पर जज़्बातों को लफ़्ज़ों में कभी पिरोया नहीं..

लोग कहते है कि मेरा दिल पत्थर का हो गया

मैंने लोगों के सामने कभी पलकों को भिगोया नहीं..

दिल-ए-मुज़्तर को उसके ख़्यालों से न सँवार पाया

पर आज भी उम्मीदों की कश्ती को डुबोया नहीं..

कुछ ज़ख़्म-ए-हयात ऐसे होते हैं तो शादाब लगते हैं

मैंने आँसुओं से उन ज़ख़्मों को कभी धोया नहीं..!!

#तुष्य

दिल-ए-मुज़्तर: अशांत ह्रदय, ज़ख़्म-ए-हयात: ज़िंदगी के ज़ख़्म

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