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दर्द-ए-अल्फ़ाज़...

Dr. SandeepDr. Sandeep March 2, 2022
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कभी शर्म-ओ-हया से तेरा वो पलकें झुकाना

तो कभी देख मुझे गैरों की तरह नज़रें चुराना

बहुत आसान था तेरे लिए ऐ मेरे हम-सफ़ीर

अपने इस मुरीद-ए-ख़ास पर बिजली गिराना..!!

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हम तो फ़िदा हैं तेरी सिर्फ़ एक मुस्कुराहट पर

अहल-ए-हुनर ख़ूब आता तुम्हें दिल को लुभाना

अगर चाहते हो तो शौक से लो इम्तिहान मेरा

पर सहरा-ए-दिल मय-ए-इश्क़ के लिए न तरसाना..!!

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मेरे बेताब दिल को और बेचैन मतकर हम-क़लम

सताता है तेरा चोरी-छुपे रातों को ख़्वाबों में आना

लबों से कुछ कहते नहीं लफ़्ज़ों से जताते हो सब

सितमगर रोज़ सताता है तेरा मुझको आज़माना..!!

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माना दूर हूँ तुझसे पर लफ़्ज़-ए-एहसास जानता हूँ

सैकड़ों लफ़्ज़ों में तेरे दर्द-ए-अल्फ़ाज़ को पहचाना

इन लफ़्ज़ों के पीछे जो अश्क-ए-ग़म छिपाए तुमने

आँखों से गिरते मोती की क़ीमत को मैंने ही जाना..!!

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चाहो अगर तुम तो हाल-ए-दिल सुना सकते हो

समझते हो अपना तो मुझे दर्द-ए-दिल सुनाना

होठ बेशक ख़ामोश हैं पर कह रही मेरी क़लम

इस दिल-ए-मुज़्तर को अल्फ़ाज़-ए-कलम से सजाना..!!

#तुष्य

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