प्रेम लीला's image
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शब्द पढ़े, 
फुहारों से,
थी कुछ बूँदें भर,
जिनकी कहानी,
फव्वारे के 
पाइप के पीछे,
जुड़ी बहती नदी,
में तिर कर,
कण कण पिघल,
उत्तर के पर्वत शिखरों,
से फिसले बरफ के,
कतरों सी,
उड़ी थीं देश विदेश,
बादलों पर लद कर,
जो कुछ फाये भाप के,
लहरों से उठे थे!
उन्हीं नदियों,
सागरों से,
जो अब इस फव्वारे के,
पीछे जुड़े पाइप,
में बहते हैं!
प्रेम का आह्लाद,
शायद यही है,
बदलता हर पल,
फिर भी एक तत्व!
जैसे साँसों मे,
बहती हवा,
रखती है बाँधे,
अनेक जीवन,
खुद रह कर,
फिर भी
बस एक!!

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