वनवास's image
Share0 Bookmarks 24 Reads0 Likes

वनवास

 

बाहों में समुंदर हो कर भी 

रूह मेरी प्यासी रह जाती है

सदियों से खारापन मिटाने को

समर्पण करती आई खुद को  

 

क्यूँ मैं उस में समर्पण कर के  

अस्तित्व अपना खो दूँ !

खुद का वजूद बचाने…

रूह को तृप्त करने… 

मैंने आज से…

समुंदर की ओर रुख़ करना छोड़ दिया 

रेगिस्तान की ओर मुँह मोड़ लिया

 

अब समुंदर को वनवास भोगना होगा

मेरे विरह में खुद को बदलना होगा

खारे पानी को मीठा करना होगा

 

डा॰ अपर्णा प्रधान

मेरे शब्द मेरी पहचान

स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts