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इश्क की चिंगारी

Dr. Aparna PradhanDr. Aparna Pradhan July 20, 2022
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इश्क की चिंगारी


मैं कवयित्री हूँ

सुन लेती हूँ..

हवा की पत्तों से बातचीत।

महसूस कर लेती हूँ...

शजर की व्यथा।

देख लेती हूँ...

कश्ती में ठहरा हुआ जीवन।

ख्यालों के आगोश में...

बहने लगती हूँ..

शोख चंचल लहरों के संग।


आज तेरे तसव्वुर का पैरहन ओढ़कर

कोरे पन्ने पर...

इज़हार-ए-इश्क़ कर के

ढलते सूरज को थाम लिया।

जज़्बातों में डूबा पन्ना...

आसमान की ओर उछाल दिया।

ढलता हुआ सूरज...

वही थम गया...

फिर से धधकने लगा।

इश्क का सूरज...

आसमान पर छा गया।


डा. अपर्णा प्रधान 

स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित

फ़ोटो Courtesy Google


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