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माँ

(मेरी माँ को समर्पित)


माँगकर ख़ुदा से मुझे लाई है माँ

महीनों तक गर्भ में मुझे सजाई है माँ 

माँ के एहसानों को कैसे भूल जाऊं

सींचकर लहू से मुझे बनाई है माँ।


मेरी खुशियों के लिए गम उठाई है माँ

जागकर के भी मुझको सुलाई है माँ

ममता का वो आँचल कभी भूलता नहीं

दूध जिसमें छिपाकर मुझे पिलाई है माँ।


मैं आवाज दे रहा माँ कहाँ हो तुम

सो रही हो कहीं या नाराज़ हो तुम

ढूंढ़ता हूँ तुम्हें आज हर एक मोड़ पर

साथ ले लो मुझे चाहे जहाँ भी हो तुम।


ममता की आँचल के वो दिन ज़िंदा रख

माँ के अरमानों की हर तस्वीर ज़िंदा रख

बनाकर अपने आंगन में एक भोली सी मूरत

माँ से मिलने की आख़री उम्मीद जिंदा रख।


-दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी'

बालियां, उत्तर प्रदेश।




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