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'मैं किसान हूँ'


मैं किसान हूँ, मैं गुमनाम हूँ,

समाज का बोझ, वक़्त का गुलाम हूँ,

मैं किसान हूँ, मैं गुमनाम हूँ।


मैं बेपर्द हूँ, मैं बेपहचान हूँ,

बेमोल का पड़ा हुआ कोई सामान हूँ,

मैं किसान हूँ, मैं गुमनाम हूँ।


मैं सुबह की धुंध हूँ, शाम की बरसत हूँ,

किसी खूबसूरत शहर में खँडहर मकान हूँ,

मैं किसान हूँ, मैं गुमनाम हूँ।


मैं बेबस हूँ, मैं बेजान हूँ,

सत्य होकर भी मैं परेशान हूँ,

मैं किसान हूँ, मैं गुमनाम हूँ।


मैं बादल हूँ, मैं तूफ़ान हूँ

गर तुम धरती तो मैं आसमां हूँ

मैं किसान हूँ, हाँ मैं ही किसान हूँ।


- दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी'





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