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कुछ लम्हें 

हर रोज़ किर जातें हैं..

वकत के हाथों ..

कुछ लहरें 

ख्यालों की उठती हैं..

ज़हन में, 

दिल की 

सुखी रेत को 

छू-कर 

लोट जाती हैं..


एक धुआँ सा 

उठता है मन में.. 

सब खोया खोया

सा लगता है... 

कुछ अनकही बातें... 

कुछ अनसुने दर्द...

इस धुएँ में कहीं 

पिघल कर 

शून्य से हो जाते... 


कभी बादल 

उड़ता है 

कही मन के 

गगन में...

फिर इसी गगन में 

कुछ तारे 'यादों' के 

झिलमिल-झिलमिल करते हें..

फिर इस 

बादल में छुप जाते हें.. 


कुछ लम्हें 

हर रोज़ 

वक्त के हाथों से 

किर जातें हैं....


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