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चलना किसे नहीं भाता 

दूर उच्ची नीची पहाड़ियों में घूमना 

और फिर खो जाना


बबूल की झाड़ियों से सिमट कर बचना 

वो जंगली घास और 

कांस के झड़झाखड


तलाब में अकारण पत्थर मारना 

बरसते पानी में भीगना ...अच्छा लगता है 

सर्द हवाओं से 

ठिठुरती हथेलियों को सहलाना 

धूप में आलस्य रहना 

किसे नहीं भाता 


ज़िन्दगी यहीं तो है 

मेरे आस पास बिखरी हुई कई रंगों में 

समेटना तो आप को ही है !


चलना सब को भाता है 

चलते रहो 

ऐसे कि नदियां बहती है जैसे

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