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अलसाई सी सुबह और ओस की बूंदें।

Dilip LalwaniDilip Lalwani January 22, 2022
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अलसाई सी सुबह में,
उनींदी ऑंखे मेरी,
तेरी यादोँ की चादर ओढ़े हुए है,
हल्की सी नमी आंखों पर है,
यूँ की दरीचों पर ओस की बूँदे,
न सूखती है,न ढुलकती है,
यूँ लगे तेरी भीगी भीगी यादें,
दबे पांव उदास उतर रही है।

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