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आज़ाद औरतें फूँकती है जान ज़िन्दगी में,

जब बाक़ी दुनिया महज़ जी रही होती है |


वो नहीं कमाती है पैसा, 

जो फ़टी जेबों को भर, दुनिया कमाती हैं |

 

वो starbucks की कॉफी छोड़ कर,

चुनती हैं अदरक़ वाली चाय टपरी पर, 


वो मख़मल के आराम में नहीं, 

इस कहकशाँ के लाखों तारों में,

अपना मुकद्दर ढूंढ़ती हैं |


आसमान की ऊँचाइयाँ छूती हैं जो, 

हैं हिमालय के शिखर,

उनमें वो अपना ही एक प्रतिबिम्ब,

एक अक्स ढूँढ़ती हैं |


वो पितृसत्ता समाज के हिसाब से बेड़ियों में जकड़ी नहीं रहती ,

वो तो हवा से लेकर कर, अपनी मोटरसाइकिल पर डुग डुग कर, 

खो जाती हैं अपने तसव्वुर की गलियों में |

 

आज़ाद औरतें फूँकती है जान ज़िन्दगी में,

जब दुनिया महज़ ज़िन्दगी बसर कर रही होती है ! होती है !


~दीक्षा अधिकारी

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