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तसव्वुर नहीं किसी का

DhirawatDhirawat January 31, 2022
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खफा यूँ हो भी जाओ, मुझे डर नहीं किसी का,
कहता जो “हूँ जहाँ का”, अक्सर नहीं किसी का।

इख्लास की मिसालें, देता रहा हक़ीक़ी,
था सब्ज़ बाग सारा, मगर नहीं किसी का।

मंज़िलों पे ज़ोर तेरा, शायद से चल भी जाए,
मंज़िल खरीद ले तू, सफ़र नहीं किसी का।

बच्चा जो सरे राह, खिलोने है बेचता
मानिन्द नहीं, लख़्त-ए-जिगर नहीं किसी का।

बुज़ुर्ग बिना दांत जो, लगाए है ठहाके,
यूँ ना मानो मुअज्ज़ज़, दिलबर नहीं किसी का।

वादा फ़रोशी दुनिया में, बढ़ती ही जा रही है,
इन झूठे दिलासों से, बसर नहीं किसी का।

जो ख्वाबों में वस्ल की, बख्शी थी नेमतें,
झूठ-ओ-फरेब से अब, गुज़र नहीं किसी का।

हमकदम चलें तो, हम क्या से क्या ना कर दें,
जो मेरा-तुम्हारा है, हमसफ़र नहीं किसी का।

इक उम्मीद सी रह-रह के, उठती है आज भी,
यूँ नहीं कि मुझको, तसव्वुर नहीं किसी का।

जहाँ में बेमुरव्वत, तुम ही नहीं धीरावत,
लेकिन जो आपका है, असर नहीं किसी का।

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