नज़र-ए-इनायत's image
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हुयी महफ़िल में मुझ पे तेरी नज़र-ए-इनायत यूँ, मेरी मौसिकी का बोलबाला हो गया।

है अब्सार से तेरे बरसता नूर कुछ ऐसा, शब-ए-ज़िंदगी में फिर से उजाला हो गया।


सुर्ख आरिज़ ये जब बेहिजाबाँ हुए, दिन में बादल छँटे और उजाले हुए,

गिराए तूने स्याह गेसू कांधे पर, मानिन्द-ए-अंधेरा-ए-शब दिन ये काला हो गया।


ऐसे ज़ुल्म करता है ये हर कदम तेरा, कि ज़ुर्म हौले भी इन को जमाना हो गया,

मग़रूर निकल आये गुज़रगाह पे ऐसे, हर लचक-ए-कमर पे काज़ी का हवाला हो गया।


इक जो आस छुप कर साँस भरती थी, तुझको देख कर वो बेतहाशा भागे जाती है,

और बेकाबू मचलती धड़कन-ए-दिल को, यूँ मानो संभाले इक ज़माना हो गया।


मुझे देखके तेरे लबों पे जो खिलती तबस्सुम है, इसी को तो सयाने इश्क कहते हैं,

तबस्सुम में तिल-ए-लब ऐसे खिलके आता है, कि मुश्किल मेरा नजरें हटाना हो गया।


तुम जो हँस दो खिलखिला कर तो, ख़िज़ाँ में भी हो गुलज़ार हर गुलशन,

तुम जो बोलते भी हो तो ऐसे तकल्लुफ़ से, कि सुन करके बेख़ुद हर सयाना हो गया।


इस अदा से ढलकाया है तूने दुपट्टे को, कि हर अदीब शहर में तेरा दीवाना हो गया।

यूँ सब का चैन लूटे है ज़िक्र-ए-शबाब तेरा, तेरी बात करना भी अब तो क़ातिलाना हो गया।


सोचकर तस्वीर तेरी दिल ने बनाई है, अब ख़्याल भी तेरा सबब-ए-रुसवाई है,

दिल-ए-नादान को समझाओ धीरावत, तेरा अशआर लिखना भी अब तो आशिक़ाना हो गया।

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