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महारुद्र के तुम त्रिशूल: हर युग धर्मयुद्ध

DhirawatDhirawat November 9, 2021
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महारुद्र के तुम त्रिशूल,
अरि ह्रदय में धँसे शूल।
धधके रक्तिम नेत्रों में ज्वाला,
छीनें यम के मुख से निवाला। 
कर पार्थ तुम रिपु दमन,
रणक्षेत्र का करो शमन।
गांडीव की कर टंकार,
शत्रु दल में हाहाकार।

छोड़ो आज रुदन और क्रंदन,
तोड़ दो आज मोह के बंधन।
त्यागो आत्म मंथन स्वरचित,
करो क्षीर-मंथन, क्षत्रियोचित।
संग्राम कदापि नहीं सरल,
हो नीलकंठ करो ग्रहण गरल।
उठो, करो तुम वज्र प्रहार,
प्रतिद्वंदी करें सब चित्कार।
गांडीव की कर टंकार,
शत्रु दल में हाहाकार।
महारुद्र के तुम त्रिशूल,
अरि ह्रदय में धँसे शूल।

किंकर्तव्यविमूढ़ ना हो, 
अराति प्राणज्योति हर लो। 
उत्तरदायित्व से मुँह ना मोड़ो, 
कर्तव्य परायणता ना छोड़ो।
ना क्षात्र धर्म से हो विरुद्ध,
यह कुरुक्षेत्र, यह धर्मयुद्ध।
भारतवर्ष की करुण पुकार,
उठो धनंजय दो ललकार। 
गांडीव की कर टंकार,
शत्रु दल में हाहाकार।
महारुद्र के तुम त्रिशूल,
अरि ह्रदय में धँसे शूल।

कौन्तेय खोलो प्रज्ञाचक्षु,
अब तक देखा मर्त्य रूप।
बढ़े धरणी पर पाप संताप, 
देखो मेरा विराट स्वरूप।
ना जीये कोई ना रहे मृत,
मनुष्य मात्र एक निमित्त।
मैं ही एकल रहूँ खड़ा,
तथा शवों से पटे धरा।
मैं धरती पर लूँ अवतार,
करूँ अधर्मी का संहार।
गांडीव की कर टंकार,
शत्रु दल में हाहाकार।
महारुद्र के तुम त्रिशूल,
अरि ह्रदय में धँसे शूल।

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