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छुईमुई सी तू सिकुड़ जावे

DhirawatDhirawat October 2, 2021
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मेघों सी तू घुमड़ आवे,

नदिया सी तू उमड़ आवे।

कनक दमकता रूपरंग,

छुईमुई सी तू सिकुड़ जावे।



ठुमक चलत गज गामिनी,

ज्यूं चमकत दिन में दामिनी,

नयन मनोहर अंतरंग,

नयन नयन से लड़ जावे।



अनल वक्ष में दहक-दहक,

हृदय कामातुर बहक-बहक,

वाणी तेरी जल-तरंग,

जैसे उर में पावक भड़कावे।



सुडोल कटी-मध्यागं तेरा,

किस ने गढ़ा सर्वांग तेरा?

मोह ले तेरा हर अंग-अंग,

साधक भी देख बिगड़ जावे।



डस लें भुजंग से श्याम केश,

लिपटे जो भूले वो ग्राम-देश,

फिर करें निराले रासरंग,

रसधार अपार निचुड़ जावे।



भूला सर्वस्व मेरे मन में,

पड़कर तेरे सम्मोहन में।

धीरावत का‌ ध्यान भंग,

देख पिनक सी चढ़ जावे।


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