अप्सरा तुम आई's image
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पुष्प अनगिन खिले उपवन में,

रंग नित नए घुले हैं जीवन में।

कामना में उतराते नयन से,

मधु रस तुम भर गए मन में।


भ्रमरों की अठखेली,

अधर करें रंगरेली,

सोलह श्रंगार करे,

नित नार तू नवेली।

पुष्पमाल ग्रीवा पर,

ऐसी सुहाए है, जो कनक तन पे।


गैंदे की सी सुगंध,

हरसिंगार रूप-रंग।

उर्वशी तू, मेनका तू,

सबका हो ध्यान भंग।

शाकुंतलम मेरे लिए,

जैसे अप्सरा तुम आई नंदन से।


लता कोमल भुजा,

सौंदर्य शाश्वत अजा,

मध्यांग की लचक,

लालसा की ध्वजा।

क्षमाप्रार्थी ईश्वर से,

तेरे विचार मुझे, करें वंचित वंदन से।


धीरावत

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