धूप छांव का खेल's image
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ये धूप छांव का खेल मुझ संग न खेलिए..!
मैं आगे निकल चुकी हूं, वापस न धकेलिए..!!
जिन अंधेरे रास्तों से, गुजरा मेरा सफर है..!
उनमें दीप बन जली हूं, कमजोर ना समझिए..!!
तन्हा ही रहूं, यही सही है, मुझे संग नहीं अब  जंचता..!
अपना कहकर फिर से मुझे, तन्हाईयां न परोसिए..!!

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