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मैं कहती तो हूं

मुझे नींद बहुत आती है

लेकिन मेरे बिस्तर की

सिलहट बताती है

मुझको नींद ही नहीं आती है

मोहब्बत में मुकाम हर 

किसी को मिले जरूरी नहीं

इसलिए यह हंसी खता हर

किसी से होती नहीं

जख्म अभी हैं हरे भरे

मैं अंदर से हूं बहुत भरी

फिर भी आंखों को 

आंसू से कभी नहीं भरे

दिल टूटा सपने बिखरे हैं

मुझसे अपने भी रूठे हैं 

वह तो फिर भी एक अजनबी था 

उसके लिए हर किसी के 

सामने अक्ष बहाऊ जरूरी नहीं 

मैं मोहब्बत में तमाशा

बन जाऊं हरगिज़ नहीं..

दीपक (बेख्याली)




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