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चलो सारी दुश्वारियो को दूर करते हैं


एक शाम बनारस के घाट पर मिलते हैं


तुम्हें शिकायत है मुझसे


की मैं समय नहीं दे पाती 


लेकिन


समाज से हमें इस तरह मिलने की


इजाजत नहीं मिल पाती


चलो छोड़ो यह सब बातें


कुछ अपनी बातें करते हैं  


जब मेरी उंगलियां 


तुम्हारी उंगलियों से उलझेगी


तब सारी गुथीया सुलझेगी 


तुम प्यार, मोहब्बत पर लिखते हो


मैं आज की  शाम तुम पर लिखूंगी


तुम जो मेरे पहलु में आकर बैठे हो....



दीपक (बेख्याली)


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