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मैं खाकी हूं


आंखों में सपने मैं भी पालती हूं


मेरा भी घर आंगन है 


उसमें आखें राह मेरी भी ताकती हैं 


कर्तव्य पथ पर आगे निकलती हूं 


किंचित भय में ना जीती हूं


ना जाने कितने अनजान चेहरों से


मैं परिचित होती हूं


मैं खाकी हूं


आंखों में  सपने मैं भी पालती हूं


बिना रिश्तो के, बिना पहचान के


ना जाने कितनों का मैं कंधा हूं 


कितने दिलों की आस हूं 


अमावस्या के अंधकार में


ना जाने कितनो का  मैं प्रकाश हूं


मैं खाकी हूं 


आंखों में सपने मैं भी पालती हूं...


अन्याय का नाश हूं


अधर्मी के दिलों का मैं ही त्रास हूं 


मां भारती का प्रत्येक नागरिक


भयमुक्त जीये, वो छोटा सा मैं प्रयास हूं 


मैं खाकी हूं 


आंखों में सपने मैं भी पालती हूं...


दीपक (बेख्याली)



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