सफ़र जिंदगी's image
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शाम होने को आई थी, बादल आकाश में तांडव कर रहे थे, हवाएं बादल को चीर रही थी मानो ऐसा लग रहा था कि इंद्रदेव क्रोधित हो चुके हों। मैं परीक्षा देकर हापुड़ जंक्शन पर पहुंचा ही था कि बारिश शुरू हो गई। बौछार इतनी तेज थी कि हम भीग रहे थे। बारिश से खुद को बचाते हुए 3 बच्चे दिखाई दिए। उनमे से जो सबसे बड़ी लड़की थी वह लगभग 10 साल की रही होगी उसने 2 साल से भी कम बच्चे को गोद में लिया हुआ था और उसके साथ एक लड़का था जो लगभग 4 साल का रहा होगा। वे तीनों अपने छोटे-छोटे कदमों से लंबे-लंबे रास्ते तय करते हुए मेरी तरफ भागे चले आ रहे थे।
                   मैं कुर्सी पर बैठा था वे तीनों आकर मेरे कुर्सी के बगल में जमीन पर बैठ गए। छोटे बच्चे को बचाने के चक्कर में उस लड़की (जो शायद इन दोनों की बड़ी बहन रही होगी) का दुपट्टा भीग गया था उसने दुपट्टा सूखने के लिए मेरे पीछे कुर्सी पर फैला दिया।

                  लड़का शांति से मेरे पास में बैठा था मैं जब भी उसे पुचकारता तो वह हंस पड़ता था। और जो छोटा बच्चा था वह रोए ही जा रहा था उसकी बहन उसे एक मां की तरह चुप करा रही थी वह फिर भी चुप नहीं हो रहा था। जब भी मैं उसकी तरफ देखता था तो वह मुझे ही देख रही होती। शायद वह मुझसे कुछ कहना चाहती थी मेरा ध्यान बार-बार उसकी तरफ ही जा रहा था अंत में मैंने पूछ लिया।
         - भूख लगी है क्या ?
लड़की -हां भैया, बहुत तेज; इसलिए यह भी रो रहा है।

                     एक चाचा जो वहीं पर छोले बेच रहे थे मैंने उनसे लड़की को छोले देने को कहा और छोटे बच्चे के लिए बिस्कुट खरीद कर दिया। अब तक बारिश बंद हो चुकी थी। कुछ देर बाद लड़की ने छोटे बच्चे को गोद में उठाया और लड़के का हाथ पकड़ा। वे जिस रास्ते से भागते हुए आए थे उसी रास्ते से धीरे-धीरे चले गए ...

     "शायद जिंदगी को स्टेशन कहना गलत ना होगा।"

~दीपक चौधरी 

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