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बहुत हुआ अमावस्या का अंधकार 
अब पूर्णिमा का चाँद आऐगा 
बहुत हुआ रोना अबकी बार रूलाया जाऐगा 
जो ना मिला उसका गम अब और नहीं 
जो हैं अब उसमें ही जश्न मनाया जाऐगा
थक गऐ लोगों की सुनते सुनते 
अब सिर्फ खुद की सुन ,
मंजिल की तरफ़ बड़ा जाऐगा 
बहुत हुआ अमावस्या का अंधकार 
अब पूर्णिमा का चाँद आऐगा

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