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सोया हुआ जमीर

Daleep NagraDaleep Nagra September 12, 2021
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जुलम सहते जा रहे हो और जुबां भी ना खोल पा रहे हो

मर चुके हो अंदर से बस जिंदा दिखने के लिए जिए जा रहे हो!


हर बार ही ऐसा होता है, एक लुटेरा जाता है दुसरा लुटने आता है

वादों का सफ़ेद लिबास पेहन कर भावनाओ का शतरंज बिछाता है

जिंदगी ये कैसी जिये जा रहे हो, कपड़ा वही पुराना बार-2 सीए जा रहे हो!


मर चुके हो अंदर से बस जिंदा दिखने के लिए जिए जा रहे हो !


भूल कर फ़र्ज़ अपने, पहचान तुम्हारी बताने में लगे हैं

धरम ,जात और नसल का देकर वास्ता, एक दूजे से लड़ाने में लगे है

जैसा चाहते थे वो, तुम ठीक वैसा किए जा रहे हो

पकड़ कर मुद्दे झूठ के असल से गुमरा हुए जा रहे हो!


मर चुके हो अंदर से बस जिंदा दिखने के लिए जिए जा रहे हो!


महामारी में बद्तर हाल हुआ, कितनी जानो का नुक्सान हुआ !

बस सर पक्कड़ के कोसता है, पर स्वाल न कोई पूछता है

महामरी से भी ज्यादा दोषी है ये कुर्सी वाले

और दोष तुम किस्मत को दिए जा रहे हो!

क्या है मजबूरी जो घुंट ये कड़वे बंद आंखों से पिए जा रहे हो!


मर चुके हो अंदर से बस जिंदा दिखने के लिए जिए जा रहे हो !


आफत, आपादा या महंगाई सबकी मार तुमने खाई !

इस बार जरा अकल लगाना बहरूपियो की बातो में ना आना !

कितनी कुर्बानियां देकर संभाला वतन को, क्यों ये भुलते जा रहे हो 

छोड़ कर गीत देश प्रेम का, गुनगान ये किसका किए जा रहे हो !


मर चुके हो अंदर से बस जिंदा दिखने के लिए जिए जा रहे हो !


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