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संवेदनशीलता

VIKKY SINGHVIKKY SINGH October 6, 2022
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किसी इंसान को जीवनगति नित प्रतिदिन अपने अलग अलग आयाम को छूती है। एक मातापिता के जीवन में जब उसका बच्चा आता है तो शायद ही उस खुशी को बयान करने के लिए शब्द बने हो। चाहे वो किसी अमीर घर में पैदा हुआ बच्चा हो या गरीब की झोपड़ी में पैदा हुआ एक गरीब बच्चा। मां और बाप उसकी हर एक खुशी के लिए हर एक चीज कुर्बान कर देते है। भारतीय समाज हमेशा से एक सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करता आया है। जहां प्रत्येक रिश्ते की अपनी एक मर्यादा और एक सभ्यता रही है। 

लेकिन आधुनिकता के दौड़ में हमने बहुत कुछ खोया है, कुछ पाने की ख्वाहिश में, और सबसे बड़ी चीज हमने खो दी है वो है "संवेदनशीलता" 

एक पुरानी कहावत थी " पुनः मूषको भवेत्" । हम फिर वही बन गए जो हम थे आदिमानव। 

खास कर के हमारा जो बर्ताव था बड़ो के प्रति, बच्चों के प्रति, औरतों के प्रति और खास कर के वृद्धों के प्रति उस में सबसे ज्यादा कमी आई है।

क्या आपने कभी सोचा है कि आज कल आप सोशल मीडिया और अखबारों तथा अन्य समाचार पत्रों में बलात्कार की घटनाओं पर कितना ध्यान देते है ? 

याद कर जब निर्भया कांड हुआ था तब देश में किस तरीके की भावना बनी थी, क्या वो अब भी हमारे में जीवित है ? 

एक बार जब हाथी के पेट में विस्फोटक डाल के उसकी हत्या की गई थी तब आपकी संवेदना क्या रंग लाई थी ?

याद करिए जब एक बच्चे जिसके एक खास किस्म की बीमारी हुई थी जिसके इलाज के लिए कुछ दिनों में करोड़ों रुपए एकत्रित कर लिए गए थे।

लेकिन अब आप उस संवेदना का उपयोग सिर्फ सोशल मीडिया पर कमेंट करने में करते है। 

शिक्षा में आप याद करिए जब तक आप शिक्षक में भगवान देखते थे आपका बच्चा भी संस्कारवान बनता था जब से आप शिक्षक को सिर्फ एक मासिक मजदूरी पर काम करने वाला समझा है आपके बच्चे में उसकी झलक आपको स्पष्ट दिखाई देती है। आपको आपके बच्चे की बातों से यह साफ पता चलता होगा की आपका बुढ़ापा कैसा कटेगा। उसके व्यवहार में परिवर्तन सिर्फ संवेदना की कमी दर्शाता है। 

आप इंसान की संवेदनहीनता का अंदाजा इस बात से लगा सकते है की बिस्तर पर पड़े हुए वृद्ध को वो सिर्फ एक शरीर मानता है जिसके होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

जिस बच्चे को पालने के लिए, जिस बच्चे को साफ रखने के लिए प्रति दिन उस बच्चे के गंदे कपड़े को धोने कभी शौच ने डूबे हुए तो कभी धूल में सने हुए लेकिन उस मां और बाप को एक ही कपड़े में शौच करते उसी को दस दस दिनों तक पहने हुए छोड़ देना यह आपकी संवेदनहीनता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। 

आप समाज में भेद भाव मिटाने की बात करते है मगर बिस्तर पर बीमार पड़े मां बाप की जूठी थाली में खाना आपके मन में घृणा का भाव पैदा करता है जिस मां ने आपके मुंह के जूठन को भी खाया था। शायद आपको याद न हो की आपके पिता ने आपके लिए कपड़े जिसको आपने अपने जीवन में पहना था उस कपड़े की कीमत क्या चुकाई थी मगर आप उस बाप में शौच से गंदी धोती को छूने से भी कतराते है। 

शायद आपको याद ये भी ना हो की बचपन में जब आप बीमार पड़े थे तो मां आपकी आपके लिए यूं कहे तो आपकी जान बचाने के लिए कई रातों तक आपको गोद में ले कर सोई नहीं थी। 

मगर जब आपके मां बाप बीमार हो जाते है तो आप ब्राह्मण बुलाकर दान करने लग जाते है । 

याद करिए जब किसी ने आपको मोटा कहा हो, याद करिए जब किसी ने आपको एक थप्पड़ मार दिया हो, आपकी मां ने आपको उसकी नज़र से बचाने के लिए उसको बहुत खरी खोटी सुनाई होगी और आप इस बूढ़े मां बाप को यह कहते भी नहीं कतराते की अब उमर हो गई अब कितना दिन जिएगी। 

गौर करिए जिस परिस्थिति को आप आपने बच्चों को दिखा और सीखा रहे है क्या वो परिस्थिति आपके साथ दुहराई नहीं जाएगी इसकी क्या गारंटी है? 

याद रखिए हर एक वस्तु पुरानी होती है। जो मजबूत है आज, कल कमज़ोर भी वही होगा। आज आप अपने बच्चों को संवेदना से दूर कर रहे है कल वो आपसे ही दूर हो जाएंगे। 

भौतिकता के दौड़ में हम गांव भूल गए, भौतिकता के दौड़ में हम रिश्ते भूल गए, भौतिकता के दौड़ में हम नैतिकता भूल गए, भूल गए की हम इंसान है। जानवर भी जानवर के मरने पर रोता है लेकिन हम खुद के मां बाप के मरने से पहले ही भोज की चिंता करने लगते है। जिसने आपके भूख के खातिर अपने शरीर को दांव पर लगा दिया हो आप उसके मरने से पहले भोज की खोज करते है। इस दौड़ में सबसे प्रेरणादायक वो है जो किसी की भी पीड़ा में दिल से साथ दे ना की बस सिर्फ साथ दे। 

 जो भी इस लेख को पढ़ रहे है मेरी विनम्र गुजारिश है की कभी भी उस इंसान के साथ न रहिए जो संवेदनहीन हो। 

क्योंकि जो अपने मां बाप के प्रति निष्ठुर हो सकता है वो आपके प्रति भी हो सकता है। गरीब इंसान कहीं ज्यादा बेहतर है एक संवेदनहीन इंसान से।

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