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प्रेम के अश्रु

VIKKY SINGHVIKKY SINGH June 15, 2022
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चलो मान लिया मुहब्बत थी ही नहीं,
वो तकरार ही सही, होती ही होगी,
तकिए के नीचे मुंह छुपा, रोता मैं,
थोड़ा ही सही, वो भी रोती ही होगी।

जिस रिश्ते में बंध कर हम, 
एक संग सब जीना सीखें,
उन रिश्तों को भूलने में, जरूर ही
थोड़ी परेशानी तो होती ही होगी।
तकिए के नीचे मुंह छुपा, रोता मैं,
थोड़ा ही सही, वो भी रोती ही होगी।

थोड़ी उसकी मुस्कुराहट से, 
खुशी मुझे भी होती ही होगी,
उस गुमनाम मुसाफिर की,
मंजिल कहीं तो होती होगी।
शाम तले अंधेरा होगा,
सुबह कही तो होती ही होगी
तकिए के नीचे मुंह छुपा, रोता मैं,
थोड़ा ही सही, वो भी रोती ही होगी।

प्यार के इस उधेड़ बुन में,
हंसना रोना, खोने पाने की,
तलब तो होती ही होगी।
तुम भूल सको तो भूलो मगर,
गलतियां तो सभी से होती ही होगी
प्यार के बंधन में, तुम बांहों में उसके
पलक बिछा, सोती ही होगी,
तकिए के नीचे मुंह छुपा, रोता मैं,
थोड़ा ही सही, वो भी रोती ही होगी।

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