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सच और इतिहास...

Abhishek ChaturvediAbhishek Chaturvedi May 9, 2022
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आओ कहीं दूर चलें, कुछ इतिहास लिखते हैं
इतिहास जगाने से पहले, भूगोल देखते हैं
भौगोलिक स्थिति के कारण, वातावरण तो ठीक है
वातावरण में बैठकर, कुछ इतिहास लिख़ते हैं


इतिहास की अपनी, भाषा अलग, अलग पहचान है
संस्कृतियों में शामिल होकर, रंग एक, एक जान है
विचारों की यह शुद्धता, आर्य संस्कृतियों की देंन है
आओ कहीं दूर चलें, चलें , कुछ इतिहास लिखते हैं


संस्कारों की ऐसी स्याही में , कलम ज्ञान की डुबोकर
मंदिर- मंदिर, मस्जिद-मस्जिद, सारे पत्थर जोड़कर
उम्मीदों के ऐसे धागों से , क्यों ना कुछ पन्ने जोड़ते हैं
आओ कहीं दूर चलें, चलें , कुछ इतिहास लिखते हैं


तुम भी वहीं हम भी यहीं, जन्म यहीं, मरण यहीं
ज्ञान की गंगा मैं ले चलूं , पाक़-ए-ज़म़-ज़म़ तुम ले आओ
आओ बैठकर भूगोल टटोलें, आओ तुम्हें संघर्ष दिखाएं
आओ बैठें, एक पास दूसरे की, कमियों का निस्तारण करें


तुम भी अपनी क़िताब उठाओ, हम भी अपने ग्रंथ उठाएं
तुम भी अपनी क़लम उठाओ, हम भी स्याहदन्डीका उठाएं
हम दोनों बैठे एक दूसरे की, बर्बरता का , यूं कुछ हिसाब लगाएं
तुम भी लिखो, हम भी लिखें, यूं अज्ञानता का अनुमान लगाएं


राष्ट्र प्रतिष्ठित हुआ तभी, समानता का, जब अधिकार एक है
प्राण एक है , राष्ट्र एक है , संविधान में धाराएं दो हैं ?

असमंजसता के बीच भंवर में, ज्ञान-विज्ञान, अधिकार भी दो हैं ?

नाउम्मीदीं के ऐसे गले धागों से , क्यों ना कुछ पन्ने जोड़ते हैं
आओ कहीं दूर चलें, चलें , कुछ इतिहास लिखते हैं

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