कविता-प्रेम और स्वार्थ's image
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अच्छी बात है                           
शहर में बढ़ रही                       
गौरैयों की सँख्या                       
कुछ बर्षों पहले                       
जिन्हें तलाशतीं थीं                     
नज़र अब दिख जातीं                 
यहाँ वहाँ छत पर                     
सड़कों पर चुगते                       
हुए दाना...
दुःख और चिंता
का विषय है
14-15 बर्ष की
नन्ही चिरैयों के
घर छोड़ने की घटनाएं
जो बढ़ गईं
पिछले कुछ महीनों में
प्रेम के नाम पर
वो भूल जातीं
उस माँ का प्रेम
जो तबसे है
जब पहली बार
अहसास किया
उसने अपने अंदर
एक नये जीवन का
उस पिता का प्रेम
जो तबसे है
जब बताया होगा
माँ ने कि
आने वाला है
उनके जीवन में
एक नया जीवन
उन भाई बहनों का प्रेम
जो जन्म से जारी है
बिना किसी शर्त
चार दिन के प्रेम में
भुला दिया जाता
निश्छल प्रेम
और स्वार्थ को
प्रेम का नाम दे
धकेल दिया जाता
हाशिये पर
प्रेम...

बृजेश कुमार 'ब्रज'

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